Varnamala in Sanskrit

Varnamala in Sanskrit

वयं वर्णमालां पठाम: (प्रथम: पाठ:) 

किसी भी भाषा को जानने व समझने के लिए उस भाषा की वर्णमाला को जानना बहुत ही जरूरी है | आइए आज हम संस्कृत की वर्णमाला (Varnamala in Sanskrit) के विषय में विस्तारपूर्वक अध्ययन करतें है |

संस्कृत व हिन्दी की वर्णमाला एक समान है | हिन्दी का जन्म संस्कृत भाषा से ही हुआ है अर्थात् संस्कृत हिन्दी की मातृभाषा है |

वर्णों के भेद :- वर्ण दो प्रकार के होते है | वर्णा: द्विविधा भवन्ति |

1. स्वर (स्वरा:) |

2. व्यंजन (व्यंजनानि) |

1. स्वर (Varnamala in Sanskrit) 

परिभाषा :- जो वर्ण स्वतंत्र रूप से उच्चरित होता है उसे स्वर कहते हैं |

स्वर :- अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, दीर्घ ऋ, लृ, ए, ऐ, ओ, औ | (13)

हिन्दी में स्वर :- अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ | (11)

“अं” और “अ:” स्वर नहीं होते हैं |

स्वर के भेद (प्रकार) :- स्वर तीन प्रकार के होते है – 1. ह्रस्व स्वर (लघु स्वर), 2. दीर्घ स्वर, 3. मिश्रित स्वर |

1. ह्रस्व स्वर (लघु स्वर) :- जिस स्वर के उच्चारण करने में कम समय लगता है उसे ह्रस्व स्वर कहते हैं |

(अ, इ, उ, ऋ, लृ)

“लृ” स्वर हिन्दी में नहीं होता है यह केवल संस्कृत में ही होता है |

2. दीर्घ स्वर :- जिस स्वर के उच्चारण करने में ज्यादा समय लगता है उसे दीर्घ स्वर कहते हैं |

(आ, ई, ऊ, दीर्घ ऋ) “ऋ” को दीर्घ बनाने के लिए ऋ की मात्रा (ृ) लगा देते है |

3. मिश्रित स्वर :- जो स्वर दो असमान स्वरों के मेल (सन्धि) से बनता है उसे मिश्रित स्वर कहते है |

(ए, ऐ, ओ, औ)

ए = अ + इ

ऐ = अ + ए

ओ = अ + उ

औ = अ + ओ

स्वरों की संख्या :- संस्कृत भाषा में कुल स्वर 13 होते हैं | परन्तु हिन्दी में 11 स्वर ही मने जाते हैं हिन्दी भाषा में “दीर्घ ऋ” व “लृ” स्वर नहीं होते हैं |

2. व्यंजन (व्यंजनानि) 

परिभाषा :- जो वर्ण स्वतंत्र रूप से उच्चरित नहीं होता है उसे व्यंजन कहते हैं | किसी भी व्यंजन के उच्चारण के लिए स्वर का होना आवश्यक है | जैसे :- क = क् + अ |

क, ख, ग, घ, ङ

च, छ, ज, झ, ञ

ट, ठ, ड, ढ, ण

त, थ, द, ध, न

प, फ, ब, भ,म

य, र, ल, व

श, ष, स, ह

अर्थात् कुल व्यंजनों की संख्या 33 होती है, 36 नहीं | क्योंकि क्ष, त्र, ज्ञ ये तीनों मिश्रित/ संयुक्त व्यंजन कहलाते हैं | ये किन्ही दो व्यंजनों से ही मिलकर बनते हैं इसलिए ये स्वतंत्र व्यंजन नहीं कहलाते हैं |

व्यंजन के भेद (प्रकार) :-

व्यंजन चार प्रकार के होते है – 1. वर्गीय व्यंजन, 2. अन्तस्थ व्यंजन, 3. ऊष्म व्यंजन, 4. अयोगवाह व्यंजन |

1. वर्गीय व्यंजन :- इसमें पाँच वर्ग होते हैं |

क वर्ग – क, ख, ग, घ, ङ |

च वर्ग – च, छ, ज, झ, ञ |

ट वर्ग – ट, ठ, ड, ढ, ण |

त वर्ग – त, थ, द, ध, न |

प वर्ग – प, फ, ब, भ,म |

कुल संख्या – 25

2. अन्तस्थ व्यंजन :- य, र, ल, व |

कुल संख्या – 4

3. ऊष्म व्यंजन :- श, ष, स, ह |

कुल संख्या – 4

व्यंजन हुए (25 + 4 + 4 = 33) |

4. अयोगवाह व्यंजन :- “अं” और “अ:” |

इनमे “अ” स्वर तो दिख रहा है परन्तु अनुस्वार वर्ग के पंचम वर्ण (ङ, ञ, ण, न, म) से ही बनता है इसी तरह विसर्ग में “ह” की ध्वनि उच्चरित होती है | जैसे :- अंक = अङ्क, चंचल = चञ्चल |

अर्थात् कुल व्यंजनों की संख्या 33 होती है |

क्ष, त्र, ज्ञ ये तीनों मिश्रित/ संयुक्त व्यंजन कहलाते हैं |

जैसे :-

क्ष = क् + ष |

त्र = त् + र |

ज्ञ = ज् + ञ |

द्य = द् + य |

श्र = श् + र |

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